बापू की कुटिया में | Mahatma Gandhi Story in Hindi

प्रस्तुत कहानी 'बापू की कुटिया में' लेखक को गांधीजी के जीवन-काल में उनसे न मिल पाने का रंज है तो दूसरी ओर उनकी अनुपस्थिति में कुटिया की हर वस्तु को आत्मसात करने का सुअवसर पाकर अपने आप को भाग्यशाली मानते हैं। लेखक बापू से इतने प्रभावित थे कि उनके न रहने पर बापू की वस्तुओं के साहचर्य से वे उन्हें अपने आस-पास महसूस करते हैं। 
Bapu ki Kutiya me

बापू की कुटिया में

बापू यहाँ तुम्हारी इस कुटिया में, तुम्हारे पायताने बैठकर, ये कुछ पंक्तियाँ लिख रहा हूँ। 

जब तक तुम यहाँ थे, मैं नहीं आया। यह मेरा दुर्भाग्य था या सौभाग्य? दुर्भाग्य तो था ही, क्योंकि जिसके आदेश पर अपने जीवन के प्रवाह को मोड़ दिया, जिसकी आज्ञा पर बार-बार अपने को संकटों में डाला और सबसे बढ़कर जिस विश्ववंद्य व्यक्ति के दर्शन के लिए दूर-दूर देशों के लोग आते रहे-उसकी ज़िन्दगी में उसके आवास-स्थान पर पहुँचकर, उसकी चरण-रज से अपने मस्तक को धन्य न बना सका, यह दुर्भाग्य नहीं तो क्या है? फिर बापू तुमने तो अपनी चरणधूलि से मेरे छोटे-से गाँव को भी एक दिन पवित्र किया था। अत: यह स्वभावत: ही उचित था कि जब तुम यहाँ थे, मैं आता और तुम्हारे दर्शनों से, तुम्हारे चरणस्पर्श से अपने जीवन को कृतकृत्य करता। पर यह सब नहीं हो सका। 

किन्तु देखता हूँ और आज यहाँ प्रत्यक्ष कर रहा हूँ-आदमी का दुर्भाग्य 

कभी-कभी सौभाग्य बन जाता है। लगता है, 'देर आयद दुरुस्त आयद' की कहावत बहुत ही सच हैं। यदि मैं उन दिनों आता तो क्या मैं तुम्हारे बिस्तरे के इतना निकट, इतनी देर के लिए, स्थान पा सकता था? उस शांत एकांत में, अकेले-अकेले इस कुटिाया से इतना तादात्म्य प्राप्त करने में सफल हो सकता था? अरे, तुम्हारे पायताने बैठकर अपनी लेखनी को इस तरह सार्थक करने का सौभाग्य उन दिनों क्या खाकर, किस पुरातन पुण्य-बल से पा सकता था?

तुम्हारा यह बिस्तरा-खजूर की चटाई पर एक गद्दा डालकर और उसे खादी से ढककर बनाया गया यह श्वेत-शुभ्र बिस्तरा। बापू! लगता है, तुम अभी-अभी यहाँ से कुछ देर के लिए बाहर गए हो और अभी-अभी उस हृदयकारी मुस्कान के साथ पधारोगे। तुम्हारा यह बिस्तर, तुम्हारा यह तकिया, तुम्हारी यह तुलसी की माला, तुम्हारा यह प्यारा चरखा-सब-के-सब यही तो कह रहे हैं-तुम अभी गए हो, अभी आओगे। 

किन्तु नहीं, इस कुटिया के दाहिने द्वार के निकट जो यह घड़ी और खड़ाऊँ की जोड़ी है, यह कहती है-अरे, तुम किस भ्रम में हो! बापू क्या हमें छोड़कर कभी बाहर निकलते थे? वह बाहर कहीं नहीं गए हैं। तो क्या बापू यहीं हैं, कहाँ हैं, बताओ, ओ बिस्तरे, हमारे सारे राष्ट्र के बापू कहाँ हैं? 

बिस्तरा नहीं बोलता, किन्तु खुली अल्मारी पर रखे बापू के तीनों बंदर तो इशारे से कह रहे हैं-आँख बंद करो। जबान बंद करो। कान बंद करो- अपने को आत्मस्थ करो, फिर देखोगे, बापू यहीं हैं।  

और सचमुच पा रहा हूँ बापू तुम कहीं गए नहीं, यहीं हो, इसी बिस्तरे पर, उस तकिये के सहारे बैठे हो। हाँ-हाँ, इस शांत एकांत में मैं इस सारी कुटिया को बापूमय पा रहा हूँ। (Mahatma Gandhi Story in Hindi)

देखिए, वह अपने बिस्तरे पर बैठे बापू अपने यरवदा-चक्र को घुमा रहे हैं। अभी कुछ देर पहले उन्होंने सामने रखे कलमदान से कलम निकालकर कुछ लिखा है और अब ज़रा हट जाइए, थके-माँदे बापू हाथ में तुलसी की माला लिए अपने सामने की दीवार में मिट्टी को उभाड़ से बनाए दो नारियल के वृक्षों के बीच गेर से लिखे 'ओम्' को निर्निमेष दृष्टि से निहार रहे हैं और, उस 'ओम्' के ऊपर क्या है ? - हे राम!

हे राम! आह, कल्पनालोक से उठकर मैं किस कठोर चट्टान पर पटक दिया गया! हे राम! इन शब्दों ने कहा-नहीं, बापू अब हमारे बीच नहीं रहे। वह हमसे कब के छीन लिए गए. -उस दिन, जब गोलियों के तीन भयानक धड़ाकों के बीच, दुनिया ने अंतिम बार उनके मुख से 'हे राम' सुना था। 

                 'जनम-जनम मुनि जतन कराहीं। 
                  अंत राम कहि आवत नाहीं।' 

उस दिन संसार ने पाया था । ऋषियों की परंपरा टूटी नहीं है, बल्कि उसमें नई ज्योति की एक नई कड़ी जुड़ गई है। काश, यह ज्ञान उस अज्ञानी को हो पाता, जिसने हिन्दुत्व के नाम पर इतना बड़ा अनर्थ किया। किन्तु बापू अमर हैं। अपने दिव्य रूप में वह सिर्फ़ यहाँ ही विद्यमान नहीं हैं, यत्र-तत्र-सर्वत्र उनकी सत्ता और महत्ता व्याप्त है और तब तक व्याप्त रहेगी जब तक आकाश में चाँद-तारे और पृथ्वी पर उदभिज, अंडज, पिंडज हैं। 

ओ बिस्तर! इस सादगी में भी तुम कितने महान् हो क्या इसका अहसास तुम्हें कभी होता है? अरे, तुम्हें देखकर कितने रत्नजड़ित स्वर्ण-सिंहासन भी ईर्ष्या से जलते होंगे! क्या कभी उन पर एक क्षण को भी उतना बड़ा आदमी बैठा होगा जितने बड़े आदमी को कितने ही दिनों, महीनों, वर्षों तक तुम्हें, अपने ऊपर आसीन करने का गौरव प्राप्त हो सका?

यह गौरवशाली बिस्तरा! जिसके सिरहाने दीवार से सटी काठ की तख्ती, जिसकी कठोरता को कम करने के लिए उतना ही बड़ा तकिया। थक जाने पर बापू उसी तकिये के सहारे बैठते! बिस्तरे के दाहिने-बापू की कुछ आवश्यक वस्तुएँ। पत्तों का बना यह टोकरा, जिसमें वे रद्दी कागज-पत्रों को डाल दिया करते। आज भी उसमें कुछ ऐसे कागज-पत्र हैं। उसी की बगल के समीप दीवार से सटा पीतल का थूकदान, जिसे बापू स्वयं साफ करते। कलमदान जिस पर अब भी उनकी लेखनी रखी है। यह जादू भरी लेखनी-इसने अपनी नोक से न जाने कितने लोगों के प्राणों को उद्वेलित किया! एक स्टैंड पर एक पेंसिल। फिर यह यरवदा चक्र, जिसके चक्कर से ही सारा भारत नाचने लगा, ठीक उसी तरह जिस तरह कृष्ण की वंशी से गोपियाँ नाचने लगी थी। अपने को भूलकर, कुल-परिवार को भूलकर, सारे संसार को भूलकर! उससे सटे कताई के कुछ फुटकर सामान में पूनी, ताँत आदि। फिर तीन खानों का एक छोटा-सा शैल्फ। 

बापू को समझने के लिए इस छोटे-से शैल्फ को भली-भाँति देखना ही होगा-इसमें बापू का सारा मानस-संसार समाया है। सबसे पहले इसके ऊपर एक दपत्ती पर टँगी, बड़ी अच्छी लिखी, लारिनर की सूक्ति को पढ़िए, जिसका आशय है - 'यदि सच्ची राह पर हो तो तुम्हें क्रोध करने की ज़रूरत ही नहीं, यदि ग़लत राह पर हो, तो फिर किस बिस्तर पर, किस मुँह से, आँख लाल-पीली करोगे।'

यह भी पढ़े:-

शैल्फ के ऊपर पत्थर का एक टुकड़ा, यों ही ऊबड़-खाबड़ कहीं से उठा लाया गया। यह बापू के लिए पेपरवेट का काम करता था। नीचे के दो खानों में बापू की किताबें! पहले खाने में (1) सार्थ गुजराती जोडणी कोश, (2) रिथिंकिंग क्रिश्चियैनिटी, (3) हज़रत ईसा और ईसाई धर्म और (4) श्रीमद्भगवद्गीता। दूसरे खाने में- (1) रामचरितमानस, (2) श्रीस्वास्थ्य-वृत्ति (3) आप्रभजनावली और (4) गीता आणि गीताई. किताबों के खानों के आगे एक आलमुनियम का डिब्बा, जिसमें सूत आदि। फिर, वे तीन सुप्रसिद्ध बंदर, जिन्होंने इतिहास में स्थान पा लिया है। लगता है, वे तीनों बंदर इस सूने वातावरण से घबरा उठे है। नहीं, जैसे एक ने बापू को मृत्यु की खबर सुनकर अपने कान सदा के लिए बंद कर लिए है, एक आँखों को तलहथियों से छिपाकर रो रहा है और एक अपने मुँह पर हाथ रखकर कह रहा है-अरे, अब हम-तुम क्या बोलेंगे। जिसे बोलना था, वह तं को, इस बिस्तरे को, खाली करके सदा के लिए चला गया। 

तीन बंदरों की बगल में चिकने पत्थर का एक खुशनुमा टुकड़ा जिस पर लिखा हैं-प्रेम ही भगवान है-फिर, एक चित्रकारी की हुई डिबिया जिसमें दो-तीन फुटकर चीजें। (Mahatma Gandhi Story in Hindi)

बिस्तरे के दूसरी ओर तीन छोटे-छोटे डेस्क जिन्हें वह शायद लिखने के समय व्यवहार में लाते थे। डेस्कों के बाद, खंभे से सटी चटाई पर एक छोटा—सा कालीन, जिस पर दीवार से लगा एक तकिया। यहीं मान्य अतिथि बैठाए जाते और वे बापू से घुल मिलकर बातें करते। फिर सारे घर में चटाइयाँ-ही-चटाइयाँ। 

इन्हीं चटाइयों पर देश-विदेश के बड़े-बड़े व्यक्ति बैठते और बापू के मुख से निकले वचनामृत का पान करते। बापू अपने चक्र को घुमाते हुए उनसे बात करते जाते। यों काम के साथ बात को मिलाकर मानो हमें सदा चेतावनी देते-देखो, समय बरबाद मत करो। तुम्हारी बातें भी तुम्हारे चक्र को कभी नहीं रोक सकेंगी। जिन चटाइयों पर कभी नेहरू, राजेन्द्रप्रसाद, पटेल के समान देश के बड़े-से-बड़े लोग और संसार के बड़े-से-बड़े राजनीतिज्ञ, पत्रकार, साहित्यिक बैठते थे, उन पर आज इस दुपहरिया में अकेला मैं बैठा हूँ-इस बात की कल्पना भी भावमुग्ध कर रही है। 

बापू की कुटिया में


इन चटाइयों के ऊपर एक दपत्ती पर वह क्या लिखा हुआ टंगा हैं? उसे पढ़िए

झूठ शब्दों में निहित नहीं है, छल करने में है। चुप्पी साधकर भी झूठ बोला जा सकता है। दोहरे अर्थवाले शब्दों के प्रयोग द्वारा किसी शब्दांश पर जोर देकर आँख के संकेत से और किसी वाक्य को विशेष महत्त्व देकर भी झूठ का प्रयोग होता है। वस्तुतः इस प्रकार का मिथ्या प्रयोग साफ शब्दों में बोले गए झूठ की अपेक्षा कई गुना बुरा है।'

 बापू की इस कुटिया के तीन भाग हैं। एक भाग यह है, जहाँ मैं बैठा हूँ, यहीं कभी बापू रहते थे। इसके बगल में, मध्य भाग में, एक कोठरी है, जिसमें एक चौकी पर एक बिस्तरा सिमटा हुआ रखा हैं। इस कोठरी में, अंतिम दिनों में बापूकी सेवा के लिए राजकुमारी अमृत कौर रहती थी। 

इसके तीसरे भाग में बापू का स्नानागार है। कितनी सफाई, कैसी स्वच्छता! बापू अपने कमोड़ को अपने हाथों कैसा साफ रखते। उसकी सफाई के लिए लकड़ी का ब्रुश हैं, फिनाइल की शीशी है। कमोड के आगे, कमरे में पानी की बाल्टियाँ, लोटे, मिट्टी के हंडे आदि हैं। इस भाग के दो हिस्से हैं। एक में शौच और स्नान के सामान हैं। दूसरे में एक चौकी है, कुछ तख्ते हैं-बापू के शरीर पर यहीं तेल की मालिश की जाती थी।

 'बापू की कुटिया की एक-एक वस्तु को अपलक दृष्टि से देख रहा हूँ और लिख रहा हूँ। बाँस और लकड़ी की बनाई हुई यह कुटिया, ऊपर खपरैल। दीवारें बाँस की फट्टियों की हैं, जिन पर चटाइयाँ लगाकर ऊपर से मिट्टी से पोत दिया गया है। कहीं भी चूना या किसी रंग का प्रयोग नहीं किया गया है। दरवाजे और खिड़कियाँ काफी हैं-हवा और रोशनी की कमी नहीं।'
 
Note: इस वार्ता(story) को किस लेखक(author) ने लिखा है वो में जनता नही हु, अगर आप कोई जानते हो तो Comment Box में जरूर लिखे।

यह भी पढ़े:-

मित्रो, मै आशा करता हु की आपको हमारी यह बापू की कुटिया में | Mahatma Gandhi Story in Hindi पोस्ट पसंद आयी होगी। ऐसी ही मजेदार कहानिया पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट jaduikahaniya.com की मुलाकात लेते रहिए। 
Raj Kagadiya

Hello! Myself Raj Kagadiya, I'm the founder of jaduikahaniya.com. I have been writing blogs since 2019 on blogger.com. I started this website to provide Quotes, Wishes, Suvichar, Shayari, Status, SMS, Images, and more.

1 Comments

  1. झूठ शब्दों में निहित नहीं है छल करने मे। चुप्पी साधकर भी झूठ बोला जा सकता है

    ReplyDelete
Post a Comment
Previous Post Next Post