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गुड गुड माय सन

गुड गुड माय सन

"गुड गुड माय सन" विज्ञान कथा हैं। प्रो. रमण के द्वारा आविष्कृत रोबोट के जीवन व्यवहारों के कार्यों का अद्भुत वर्णन हैं। वर्तमान समय में रोबोट के लाभ और सीमाओं का हास्य के साथ वर्णन किया हैं। 

गुड गुड माय सन


जमुनादास ने दरवाजे पर दस्तक दी। प्रा । रमण ने दरवाजा खोला। 

आइए.... आइए.... जमनाकाका...  वेलकम...  कहिए कैसे आना हुआ? रमण ने खुशी व्यक्त की। सोफा पर बैठ कर जमनकाका ने घर भर का निरीक्षण कर लिया। नोट किया कि घर में किसी भी प्रकार की चहल-पहल नहीं है। उन्होंने पूछा, 'बेटा रमण! इस प्रकार कब तक अपनी रोटी आप ही सेंकता रहेगा?' 

लेकिन मैं कहाँ अपनी रोटी आप सेंकता हूँ? 

मतलब? क्या तुमने शादी कर ली?-जमुनादास जी का चेहरा विस्मयबोधक चिह्न बन गया। 

'शादी-वादी की बात को मारो गोली...  बताइए.... घर पर सब कुछ खैरियत तो है ?' जमनकाका कोई उत्तर दें इसके पूर्व ही रमणलाल ने पुकारा ट टु टी, माय सन! 

पलभर में ही रोबोट हाथ में चाय की ट्रे लेकर उपस्थित हो गया। अचानक इस प्रकार रोबोट को सम्मुख देख कर जमनाकाका के आश्चर्य की कोई सीमा ही नहीं रह गई. रमण तो चुपचाप यह सब कुछ देख रहा था और मन ही मन मुस्कुरा रहा था। जमनाकाका की परेशानी को कम करने को इरादे से रमणलाल ने सफाई देते हुए कहा, 'काकाजी! यह आप को चाय दे रहा है, ले लीजिए.' जमनाकाका को तसल्ली हुई. उसने चाय का कप ले लिया तो रोबोट ने कहा, 'थैक्यू! फिर वह किचन में लौट गया।' 

चाय की चुस्की लेते ही जमनादास जी के मुँह से निकल गया, वाह! चाय तो बड़ी टेस्टी है भाई! ! ओए...  रमणा यह सब क्या है ?'

आपने जो देखा!-और रमणलाल हँसी नहीं रोक पाए. जमनाकाका अपने साथ कई प्रश्नों को लेकर विदा हए. इधर रोबोट को प्रोत्साहित करने के हेतु प्रा । रमण ने कहा,' गुड.. गुड..  माय सन !" थेक्यू! रोबोट ने उत्तर दिया।' 

इस प्रकार रोबोट प्रा. रमण के घर में सभी प्रकार के कार्य सुचारु ढंग से करने लगा। इसके अतिरिक्त प्रा । रमण ने निजी कार्यों में भी वह उसकी सहायता करता था। घर आये हुए प्रा. रमण के मित्रो को किसी पुस्तक की आवश्यकता हो तो रोबोट ही आलमारी से निकालकर वह पुस्तक ले आता था। अरे! प्रयोगशाला में भी वह प्रा । रमण की मदद करने लगा था। यदि कभी कभार प्रा. रमण बीमार हो जाते तो वह छोटी-मोटी दवाइयाँ भी दे देता था। प्रा. रमण अपने इस सर्जन से काफी खुश थे। इस खुशी में प्रा. रमण ने इसका नाम रखा था, मि. होंची । होंची! प्रा. रमण उसे जो कोई निर्देश दें, उसके अनुसार मि । होंची-होंची तमाम काम सफलतापूर्वक करने लगा था। यद्यपि रोबोट को निर्देश देने के लिए विशिष्ट भाषा का निर्माण किया था प्रा. रमण ने। मि. होंची-होंची वही भाषा समझता था, अन्य कोई भाषा नहीं। 

दरवाजा खोलना हो तो, डोडी डूम....  डोडी डूम.... बोलना पड़ता था। 

सब्जी काटनी हो तो, वोबू-वोबू .... कहना होता था। 

भोजन के लिए थाली टेबिल पर रखवाने के लिए, ' हू शु शेंग.... हू शु शेंग.... तथा किसी काम को करने से रोकने के लिए गोटू.... गोटू.... शब्दों का प्रयोग करना पड़ता था। 

इस प्रकार तमाम प्रकार के जीवन व्यवहारों के लिए भाषा कोड निर्धारित कर लिये थे। परिमाण स्वरूप मि. होंची-होंची प्रा. रमण का दोस्त, प्रा. रमण का साथी था। प्रा. रमण का सेवक हो गया था। इसी कारण प्रा । रमण का कारोबार खुशी-खुशी चल रहा था। 

शनैः-शनैः मि. होंची-होंची के किस्से-कहानियाँ स्थानीय समाज में फैलने लगे। तो मि । होंची-होंची की माँग बढ़ने लगी। खर्च की कोई चिन्ता नहीं, बस मि । होंची-होंची हमें चाहिए.... हमें चाहिए.... इस प्रकार के प्रस्तावों का तांता लग गया था। प्रा. रमण का सबके लिए एक ही उत्तर था-यह रोबोट अपनी प्रयोगावस्था में हैं, इसमें कई प्रकार के संशोधन-परिमार्जन करने शेष हैं....  दो एक साल के पश्चात् हम आपके प्रस्ताव पर सोचेंगे। 

कालेज का कार्य पूर्ण करके प्रा. रमण घर लौटे। कॉलबेल के लिए बटन दबाया... पर दरवाजा न खुला। आमतौर पर प्रा. रमणलाल के कॉलबेल का बटन दबाने पर तुरन्त मि । होंची-होंची दरवाजा खोलता था और वेलकम सर! कह कर उसका स्वागत करता था। किन्तु आज पाँच-छ: बार कॉलबेल बजाने के बावजूद भी दरवाजा न खुला तो प्रा. रमण सोच में पड़ गये। 

Gud Gud May San


अरे! मि. होंची-होंची को क्या हो गया है? उसने दरवाजा क्यों नहीं खोला? आखिर प्रा. रमण ने अपने हैंन्ड बेग से चाबियाँ निकाली और दरवाजा खोला। 

ओहो.... ओहो.... हो.... क्या बात है यार मेरे! मि । होंची-होंची सोफा पर बिराजमान होकर आराम से टी. वी. देख रहे हैं.... उधर टोम एन्ड जैरी के पराक्रम देखने का लुफ़्त उठा रहे हैं। 

यह नजारा देख प्रा. रमण गहरी सोच में पड़ गये। वह चुपके-चुपके उसके पास पहुँचे.... एकदम नजदीक पहुँचकर फुसफुसियाने स्वर में बोले, मि । होंची-होंची.... अचानक प्रारमण का आवाज सुनकर मि. होंची-होंची सकते में आ गये। प्रा. रमण को एकदम पास में खड़े देखकर वह फटाक से खड़ा हो गया। गुड इवनिंग सर! कह कर खड़ा रह गया। प्रा. रमण ने 'टे टु टी' कहा तो मि. होंची-होंची किचन की ओर चला गया। यह देख प्रा. रमण की चिन्ता के बादल हट गये। मि. होंची-होंची में उसे कोई विशेष गड़बड़ नजक नहीं आयी। तो मेरा दोस्त सयाना ही .... ऐसा सोचते-सोचते उसने आराम से चाय पी. 'गुड.... गुड.... माय सन' कहकर उसकी पीठ थपथपाई! "थैक्यू!" कह कर मि । होंची-होंची ने भी अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। 

इस प्रकार दिन गुजरते गये। घर आने वाले परिचित-अपरिचित मेहमानों को मि. होंची-होंची का प्रशंसात्मक परिचय देते हुए उसका हृदय बाँसों उछलता था। 

आज कॉलेज से लौटते समय प्रा । रमण के स्कूल के साथ एक मनमौजी युवक ने अपनी बाइक टकरा दी। इत्तफाक से प्रा. रमण को गहरी चोट नहीं पहुँची पर स्कूटर को थोड़ा नुकसान हुआ। प्रा. रमण आगबबूला हो उठे। क्रोधावस्था में ही बे घर पहुंचे। कॉलबेल का बटन दबाया पर दरवाजा नहीं खुला। दो चार बार जोर-जोर से बटन दबाया पर दरवाजा न खुला। अब प्रा. रमण का पारा चढ़ गया। उन्होंने चीखकर मि. होंची-होंची कहकर पुकारा.... फिर भी दरवाजा न खुला। अत: उन्होंने हुकम दिया, डो डी ड्रम .... इतने प्रयत्नों के बावजूद भी जब दरवाजा न खुला तो उनका क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया। हैन्ड बेग से चाबियाँ निकाल कर उसने फटाक से दरवाजा खोला। मि. होंची-होंची तो दुनियादारी से पूर्णत: बेखबर टी. वी. शो देखने में व्यस्त। प्रा. रमण घर में प्रवेश कर चुके हैं फिर भी उस ओर उसका ध्यान नहीं। अतः गुस्से में पैर पटकते हुए प्रा. रमण मि. होंची-होंची के निकट पहुँच चिल्लाए, मि. होंची-होंची ! ! !

 यह सुनते ही मि. होंची-होंची की मानो नींद टूटी. वह सड़ाक से खड़े हो गये, गुड ईवनिंग सर कह कर आदेश का इन्तजार करने लगे। किन्तु मि. होंची-होंची के गुड ईवनिग सर की आवाज में उसने उपहास की बू महसूस की। वैसे भी प्रा. रमण पहले से ही गुस्से में तो थे ही.... किन्तु घर आने पर मि । होची-होंची के इस व्यवहार ने उसके गुस्से की आग को हवा दे दी। परिणामस्वरूप प्रा । रमण ने मि. होंची-होंची के चेहरे पर जोरदार थप्पड़ जमा दी। लेकिन दूसरे क्षण मि । होंची-होंची ने भी प्रा. रमण के मुँह पर जोरदार थप्पड़ जमा दी। प्रा. रमण तो लुढ़क गये, आँखों के सामने अँधेरा छा गया। मि । होंची-होंची तो मानो कुछ भी हुआ ही नहीं है। इस प्रकार बुत बनकर खड़ा रह गया.... तथा अन्य आदेश की प्रतीक्षा में व्यस्त हो गया। प्रा । रमण मुश्किल से खड़े हुए । 

उसका सिर चकरा रहा था.... जैसे तैसे सोफा तक पहुँचे और इस पर लुढ़क गये। वहाँ से ही भय की हल्की-सी सिहरन महसूस करते हुए वहीं से बोले, "टेंटुटी, माय सन!" मि । होंची-होंची किचन की ओर चलने लगे। यह देख प्रा । रमण का ढाढस बँधा। फिर भी उसके मन में मि. होंची-होंची के व्यवहार में आये हुए परिवर्तन को लेकर काफी व्यग्रता बढ़ गयी थी। चिन्ता की तरंगें "ज्वार में बदल जाती" उसके पहले ही चाय आ गई. लिज्जतदार चाय की चुस्की लेते ही मन प्रसन्नता से भर गया.... चिन्ता के बादल एकदम नदारद। मानो कुछ भी अप्रत्याशित हुआ ही नहीं हैं, ऐसा हलका-फुलका माहोल हो गया। चाय खत्म करके प्रा. रमण मि. होंची-होंची की शुक्रिया अदा करने के लिए उठ खड़े हुए तथा मि. होंची-होंची के सम्मुख पहुँचे.... गुड-गुड माय.... अभी वाक्य पूरा हुआ भी नहीं था कि सड़ाक-सी आवाज करती हुई थप्पड़ प्रा. रमण के गाल पर लग गया। यह करारा तमाचा मार कर मि । होची-होंची बुत-सा खड़ा रह गया। तमाचे की चोट ने प्रा. रमण को सोफे पर लुढ़का दिया। चोट की पीड़ा से उसका गाल दर्द कर रहा था। फिर भी बड़ी मुश्किल से प्रा. रमण गोटु-गोटु का आदेश दिया मि. होंची-होंची वहाँ से चला गया। लेकिन तब से प्रा. रमण मि. होंची-होंची के सामने जाने से डरने लगे। 

एक बार उसके घर बुआ आ धमकी। फलत: प्रा. रमण ने मि । होंची-होंची को हुक्म किया, टेंटुटी. बुआ ने रमण से पूछा 'बेटा, रमण' तुम यह क्या बोल रह हो? हमारी तो कछु समझ में नहीं आवत हैं, तू पागल तो नहीं गियोरी। टे टु टी.... टेंटू.... इतने में मि. होंची-होंची चाय को ट्रे लेकर उपस्थित हो गया। मि. होंची-होंची को देखकर बुआ हक्काबक्का रह गयी। बाप रे! यह भूत कहाँ से आ गया? बचाओ.... बचाओ.... वह चिल्लाने लगी। बड़ी मुश्किल से प्रा. रमण ने बुआ को शान्त किया। उसके पास बैठ कर प्रा । रमण ने चाय का कप उठाकर बुआ को दिया तथा बाद में उसने अपने लिए कप उठाया। अलबत्ता उस वक्त उसका हाथ तनिक काँप-सा गया था। चाय की प्रथम चुस्की पर ही बुआ के मुख से आनन्दोद्गार निकल गया, ' भाई वाह! क्या लिज्जतदार
चाय बनी हैं! ! ! 'उसने रमण से पूछा,' यह कौन है भला ?' 

' यह मेरा दोस्त मि. होंची-होंची है। वही मेरा साथी और वही मेरा सेवक भी। 'यह सुनकर बुआ खुश-खुश हो गयी। वह मि । होंची-होंची की प्रशंसा करने लगी। बुआ की खुशियों को देखकर मि. होंची-होंची को धन्यवाद देने हेतु खड़े हो गये। उसकी पीठ पर अपना हाथ रख कर वह ज्यों ही गुड.... गुड बोलने लगे उसी क्षण मि । होची-होंची के दाहिने हाथ से एक जोरदार तमाचा उसके गाल पर पड़ा सड़ाक! ! वह तो डगमगा कर गिर पड़े? यह देख बुआ को गुस्सा आ गया। गुस्से की मारी वह चिल्लाई,' हरामजादे! तुमने मेरे भतीजे को पीटा। देख अब मैं तुम्हारा क्या हाल करती हूँ। चिल्लाते हुए वह मि. होंची-होंची को पीटने के लिए उसके सम्मुख जा पहुँची। इतने में तो उसके गाल पर भी मि. होंची-होंची के बायें हाथ की करारी थप्पड़ जा लगी.... सड़ाक.... बुआ बेचारी गेंद की भाँति लुढ़क गयी। बुआ को लुढ़कते देख प्रा । रमण को उन पर तरस आ गया। उसने तुरन्त आदेश दिया, गोटु गोटु और मि. होंची-होंची चुपचाप 'वहाँ से चल दिये .... टप.... टप.... टप.... 

बुआ बड़बड़ाती हुई खड़ी हुई' निगोडा.... सल्ला.... हरामी की औलाद। मुझे भी पीटता है.... नासपीटा.... ' 

बेटा रमण! ऐसा तो कोई दोस्त होता है भला? चल अभी मुझे बस अड्डे तक पहुँचा दे.... मैं यहाँ छिनभर भी रुकना नहीं चाहती.... 

प्रा. रमण ने बुआ जी को समझाने-मनाने की काफी कोशिश की लेकिन बुआ टस से मस नहीं हुई।  

फिर तो सबकुछ ठीकठाक चलने लगा। फिर भी । प्रा. रमण मि. होंची-होंची की थप्पड़ मारने की आदत से काफी चिन्तित रहने लगे। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि एसा कोई प्रोग्राम मैंने मि । होंची-होंची रोबोट में इन्सटॉल नहीं किया है फिर भी यह ऐसा बेहूदा व्यवहार क्यों करता है? प्रो । रमण की नींद हराम हो गई थी। 

अब इस मि. होंची-होंची को कैसे समझाया जाय ?.... यह प्रश्न उसकी नींद को हराम करने लगा। उसने रोबोटिक सायन्स के अद्यतन ग्रंथों का भी अनुशीलन कर लिया.... इन्टरनेट पर घण्टों व्यय किये.... अन्य रोबोट वैज्ञानिकों कोई-मेल किये.... इन्स्टोल किये गये तमाम प्रोग्राम अनुसार तो मि । होंची-होंची कार्य कर रहा है। लेकिन यह थप्पड़वाला नया कार्य वह किस प्रोग्राम के तहत करने लगा है? यही उसकी समझ में नहीं आ रहा था। वस्तुत: मि । होंची-होंची एक प्रकार का यंत्र ही है तो अब यह यंत्र-मानव कैसे बन गया? लाख कोशिशों के बावजूद भी जब उसे उत्तर नहीं मिला तो उसने देश के प्रसिद्ध वैज्ञानिक तथा अपने गुरु प्रा । डॉ । कबीर काका की मुलाकात करने का निर्णय किया यपि कबीर काका नामी वैज्ञानिक थे, किन्तु उनका बच्चे-बच्चे को वैज्ञानिक बनाने का मिशन था। लिहाजा सायन्स सीटी बनाकर वे उसी कार्य में व्यस्त मस्त रहते थे। 

एपाइन्टमेन्ट लेकर प्रा. रमण सायन्स सीटी पहुँचे तो वहाँ प्रा । कबीर काका उसकी प्रतीक्षा ही कर रहे थे। आओ.... डॉ । रमण.... कैसे आना हुआ? इसके उत्तर में प्रो । रमण ने मि । होंची-होंची के नयी हरकतों के विषय में सुनाया.... अब तो वह स्वयमेव टी. वी. ऑन कर के सोफा पर लुढकर बैठे-बैठे आराम से टी. वी. देखता है, बेशक इस प्रकार का कोई भी प्रोग्राम मैंने इस में इन्स्टोल किया नहीं है अब तो वह उसके सामने आने वाले को पीटने भी लगा है.... 

Good Good My Son


कबीर काका ने उसे बीच में ही रोकर कर पूछा, यह तुम क्या कह रहे हो ?.... सबको पीटता है? क्या मतलब?.... 

सुनिये.... मैं ज़रा विस्तार से कहूँ प्रा. रमण ने स्पष्टता करना शुरू किया, बात यह हैं कि जब से उसका थप्पड़कांड शुरू हुआ हैं, तब से भी जो भी उसके सामने आकर खड़ा होता है उसको वह अपने दायें हाथ से जोरदार थप्पड़ लगा देता है? 

अच्छा! मुझे एक बात बताइए कि । मि । होंची-होंची में आपने जो भी प्रोग्राम इन्स्टोल किये हैं इनमें मारपीट सम्बंध कोई प्रोग्राम इन्स्टोल किया है। 

ना जी.... सर.... एक भी नहीं! इसी कारण मि. होची-होंची के इस प्रकार के व्यवहार से डर लगने लगा हैं। दु: खद बात तो यह हैं कि इस दुर्व्यवहार का श्री गणेश भी उसने मुझसे ही किया है। सबसे पहला थप्पड़ मुझ पर ही पड़ा था। 

'ओहो! क्या बात करते है, आप! आपको भी! !' प्रो. कबीर काका सोच में पड़ गये। कुछ देर सोचने के बाद उन्होंने एक और प्रश्न किया, टी. वी. ऑन-ऑफ करने का कोई प्रोग्राम आपने इसमें इन्स्टोल किया था? 

ना जी !' 

क्या उसकी उपस्थिति में आपने कभी टी. वी. ओन-ऑफ किया था ? 

हाँ.... अनेक बार.... किन्तु उसने पहले कभी टी. वी. ऑन-ऑफ नहीं किया था। एक दिन अचानक ही उसने टी. वी. ऑन किया। वैसे तो उस वक्त में वहाँ उपस्थित भी नहीं था। 

प्रा. रमण का यह उत्तर सुनकर प्रा । कबीर काका गम्भीर हो गये? दत्तचित्त हो कर कुछ सोचने लगे। फिर अचानक ही वे अट्टहास कर उठे....  आहाहाहाँ....  आहाहाहाहाँ.... प्रा. कबीर का ऐसा अप्रत्याशित व्यवहार देख प्रा. रमण ताज्जुब रह गया.... किन्तु प्रा । कबीर के चहेरे पर तो आनन्द छा गया था। 

अन्ततः उन्होंने कहना शुरू किया.... प्रा. रमण.... चलिए.... मुझे अपने घर ले चलो.... घर जाकर क्या-क्या करना है इस बारे में सभी निर्देश उन्होंने प्रा. रमण को रास्ते में ही समझा दिये। साथ ही साथ सावधान भी किया.... कि देख भाई.... यह एक एक्सपिरिमेन्ट हैं.... हम सफल भी हो सकते हैं.... असफल भी हो सकते हैं। किन्तु प्रो. रमण तो किसी प्रकार का जोखिम उठाने को तैयार थे। 

कॉलबेल गूंज उठी। मि. होंची-होंची ने बाकायदा दरवाजा खोला। प्रो. रमण का तनाव कुछ कम हुआ। मि. होंची-होंची ने नियमानुसार वेलकम सर! कहा प्रा. रमण ने गुड-गुड माय सन कह कर उसे प्रोत्साहित किया। मि । होंची-होंची अपनी नियत जगह पर जा कर खड़ा हो गया। प्रो. रमण ने टेटू टी टेंटूटी का हुक्म दिया। कुछ ही देर में चाय लेकर मि. होंची-होंची उपस्थित हुआ। दोनों ने आराम से चाय पी. तब जाकर उनका ध्यान टी. वी. की ओर गया। स्क्रीन पर ईदमिलाद का दृश्य आ रहा था। उन्होंने समझ लिया कि मि, होंची-होंची ने टी. वी. ऑन किया होगा तब टी. वी. दर्शन कर रहा होगा। स्क्रीन पर ईद की नमाज के बाद मुबारकबादी देते हुए परस्पर को गले लगाते के चित्र दीख रहे थे। मि. होंची वही दृश्य देख रहा था। 

पूर्वनिर्धारित योजना के अनुसार प्रा. कबीर एवं प्रा. रमण की बातचीत में उग्रता बढ़ने लगी। दोनों तू-तू मैं-मैं पर उत्तर आए. इसी वक्त प्रा. कबीर ने प्रा. रमण के गाल पर कसकर एक थप्पड़ रसीद कर दी। फिर भी प्रा. रमण ने प्रतिशोध स्वरूप कबीर को थप्पड़ न जड़ा बल्कि खुशी-खुशी प्रा । कबीर को गले लगाकर उनकी पीठ थपथपाने लगे। मि. होंची-होंची यह सब देख रहा था। उधर टी. वी. पर ईद मुबारकवादी के दृश्य आ रहे थे। खुदा के पाक बन्दे गले मिले रहे थे। चारों ओर खुशियों की लहरे उठ रही थी। थोड़ी देर के बाद प्रा. कबीर भी प्रो. रमण के गले मिलकर चले गये। किन्तु दूसरे दरवाजे से चुपके-चुपके कमरे में प्रवेश कर यह देखने लगे कि मि. होंची-होंची अब कैसा व्यवहार करता है। 

यहाँ प्रा. रमण ने अपने भय को नियंत्रित कर परी स्वस्थता के साथ मुस्कराते हुए मि. होंची-होंची की तरफ चलना शुरू किया। धीरे-धीरे वह मि । होंची के सम्मुख जाकर खड़े रह गये। सबको चकित करते हुए मि । होंची-होंची ने थप्पड़ लगाने के बदले प्रा. रमण को गले लगाकर उसकी पीठ थपथपाना शुरू किया। प्रा . रमण ने भावविभोर हो उसको गले लगा लिया.... और यह बोलने लगे.... गुड गुड माय सन ....। 

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