हिंदी भाषा का सामान्य परिचय | हिंदी के विविध रूप

हिंदी भाषा का सामान्य परिचय: हमारा भारत एक बहुभाषी देश है। यहाँ बंगला, असमिया, उड़िया, हिन्दी, मराठी, गुजराती, कश्मीरी, तमिल, तेलुगु, कन्नड, मलयालम, कोंकणी, सिंधी, पंजाबी, इत्यादि भाषाएँ बोली जाती हैं। 
हिंदी भाषा का सामान्य परिचय

हिंदी के विविध रूप

हिन्दी देश के एक बड़े भू-भाग में बोली जाती है। हम जिसे आज 'हिन्दी' कहते हैं, वास्तव में तो वह हिन्दी की एक बोली-खड़ीबोली का विकसित रूप है। यह दिल्ली, मेरठ, सहारनपुर के आसपास बोली जाने वाली बोली है। इस खड़ी बोली में अन्य बोलियों के तत्त्वों का समायोजन करके हिन्दी भाषा बनी है। हिन्दी में कुल 18 बड़ी बोलियाँ हैं जो उसे बोले जाने वाले क्षेत्र के लोगों की मातृभाषा हैं; जैसे-हरियाणी, ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मगही मैथिली, कन्नौजी, बुंदेली, मेवाती, मारवाड़ी, जयपुरी, गढ़वाली इत्यादि। बोलियों का क्षेत्र सीमित होता है और भाषा का विस्तृता बोलने के क्षेत्र की दृष्टि से हिन्दी को हम तीन रूपों में समझ सकते हैं:

( क ) जनपदीय या आँचलिक ( ख ) राष्ट्रीय और ( ग ) अंतरर्राष्ट्रीय

 (क) जिसे हम हिन्दीभाषी क्षेत्र कहते हैं वह बड़ा व्यापक है। भौगोलिक दृष्टि से एक ओर उत्तरांचल प्रदेश से लेकर हिमाचल, दिल्ली-हरियाणा, राजस्थान तक तो दूसरी ओर उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश से दक्षिण में छत्तीसगढ़ तक फैला हुआ है। यहाँ के निवासी अपने-अपने क्षेत्रों में दैनिक व्यवहार में अपनी-अपनी बोलियाँ बोलते हैं, औपचारिक रूप से हिन्दी का प्रयोग करते हैं। इस रूप में हिन्दी की बोलियाँ जनपदीय भाषा की भूमिका निभाती हैं। इस विस्तृत भूभाग से बाहर देश के बड़े नगरों में हिन्दी का एक अलग रूप ही दिखाई देता है, जिसपर स्थानीय भाषा की शब्दावली, रूप रचना का प्रभाव दिखाई देता है, हम ऐसी को हिन्दी उन शहरों के नाम से पहचानते हैं; जैसे-बम्बइया (मुंबई) हिन्दी; कलकतिया (कोलकाता) हिन्दी, हैदराबादी (हैदराबाद) हिन्दी आदि। हैदराबाद, बीदर, गुलबर्गा आदि में बोली जाने वाली हिन्दी को दक्कनी (दक्खिनी) हिन्दी भी कहते हैं। 

 (ख) हिन्दी का राष्ट्रीय रूप खड़ी बोली पर आधारित है, जिसका मानकीकरण किया गया है। यह पूरे देश के लिए औपचारिक भाषा है, इसे 'मानक हिन्दी' कहते हैं। यह हिन्दीभाषी राज्यों में राजकाज की भाषा के रूप में भी प्रयोग की जा रही है। वास्तव में खड़ी बोली हिन्दी का विकास उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ किन्तु इसका प्राचीनतम रूप ' पुरानी हिन्दी के नाम से दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी में मिलता है। तेरहवीं शताब्दी के अंत भाग में अमीर खुसरो ने खडी बोली में कविताएँ (पहेलियाँ मुकरियाँ) लिखी; जैसे-

हरी थी मन भरी थी, लाख मोती जड़ी थी। 
राजाजी के बाग में, दुशाला ओढ़े खड़ी थी। 
या 
एक थाल मोती से भरा। सबके सिर पर औंधा धरा। 
चारों और वह थाली फिरे। मोती उससे एक न गिरे। 

अमीर खुसरो ने इस भाषा के लिए 'हिन्दी' तथा 'हिन्दुई' शब्द का प्रयोग कई स्थलों पर किया है। 

हिन्दी के आरंभिक विकास में नाथों, सिद्धों तथा संतों का बहुत योगदान रहा। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से हिन्दी को पूरे भारत में पहुँचाया। अहिन्दी क्षेत्रों के कण्हपा (कर्नाटक), नामदेव और तुकाराम (महाराष्ट्र), नरसी मेहता तथा प्राणनाथ  (गुजरात) आदि ने भी साहित्यिक हिन्दी 'के विकास में विशेष योगदान दिया। इनकी रचनाओं में हिन्दी की विभिन्न बोलियों के अतिरिक्त पंजाबी, फारसी भाषा का प्रभाव भी है। इसी समय हिन्दी तीर्थस्थानों वाणिज्य व्यवहार के क्षेत्र में भी व्यवहत हुई और एक संपर्क भाषा' के रूप में उसका विकास हुआ। 

स्वाधीनता पूर्व इस भाषा ने विभिन्न राष्ट्रीय आंदोलनों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. बंगाल में केशवचंद्र सेन और सुभाषचंद्र बोस; महाराष्ट्र में लोकमान्य तिलक; गुजरात में स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी आदि ने इसके सार्वदेशिक रूप के कारण इसे 'राष्ट्र भाषा' के लिए उपयुक्त मानते हुए समूचे देश के लिए इसे अपनाने पर जोर दिया। महात्मा गांधी ने इस राष्ट्रभाषा को 'हिन्दुस्तानी' नाम दिया। इसमें अरबी-फारसी तथा संस्कृत के प्रचलित शब्दों को बोचचाल की भाषा के रूप में स्वीकार लिया। इस समय शैली की दृष्टि से हिन्दी के दो रूप प्रमुख दिखते हैं। (1) संस्कृतनिष्ठ हिन्दी और (2) अरबी-फारसी मिश्रित हिन्दी। भारतीय स्तर पर हिन्दी संपर्क भाषा है।

स्वाधीनता के बाद 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी को संघ (भारत) की राजभाषा 'घोषित किया गया। हिन्दीभाषी प्रदेशों की मुख्य राजभाषा हिन्दी है। अहिन्दीभाषी प्रदेशों में वहाँ की अपनी प्रादेशिक भाषाएँ' राजभाषा ' बनी हैं; जैसे-गुजरात में गुजराती, महाराष्ट्र में मराठी, तमिलनाडु में तमिल तथा कर्नाटक में कन्नड़ इत्यादि। कुछ राज्यों ने हिन्दी या उर्दू को अपनी दूसरी राजभाषा घोषित किया हैं। (हिंदी भाषा का सामान्य परिचय)

पूरे भारत के स्तर पर हिन्दी का व्यवहार क्षेत्र सामाजिक, साहित्यिक, शैक्षिक, वैज्ञानिक, वाणिज्यिक एवं प्रशासनिक आदि विभिन्न कार्यक्षेत्रों तक फैला हुआ है। इनमें सामाजिक, साहित्यिक और शैक्षिक क्षेत्रों की भाषा प्राय; जनभाषा के अधिक निकट है जबकि वैज्ञानिक, वाणिज्यिक, प्रशासनिक आदि क्षेत्रों की भाषा तकनीकी भाषा है। इस दृष्टि से हिन्दी के मुख्यतः दो रूप दिखाई देते हैं- (1) जन व्यवहार की हिन्दी (2) प्रयोजनरक कार्यक्षेत्रों की हिन्दी।

Hindi ke Vividh Rup


(1) जन व्यवहार की हिन्दी के क्षेत्र: 

सामाजिक संदर्भो तथा व्यावहारिक क्षेत्रों में प्रयोग होने वाली हिन्दी के मौखिक तथा लिखित दो रूप मिलते हैं। कार्यक्षेत्र के अनुरूप इनका रूप भी अलग-अलग होता हैं। जनव्यवहार की हिन्दी के प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं:

(1) सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों और सामान्य जनता के बीच संवाद। 
(2) सभा-समारहो का संचालन। 
(3) किसी सूचना की उद्घोषणा। 
(4) चुनाव प्रचार के व्याख्यान। 
(5) किसी मैच या घटना का आँखों देखा हाल। 
(6) समाचार लेखन या वाचन आकाशवाणी, टेलीविजन। 
(7) समस्या निराकरण हेतु विभिन्न विभागों-बैंक, पोस्ट ऑफिस या रेलवे आदि से सम्बंधित पत्र व्यवहार। 
(8) फ़िल्म आदि से सम्बंधित पत्र व्यवहार इनकी शैली औपचारिक, अनौपचारिक या आत्मीय हो सकती हैं। 

(2) प्रयोजनपरक कार्यक्षेत्रों की हिन्दी:

 किसी भी देश के शासन के लिए स्वीकृत भाषा राजभाषा कहलाती है। रजभाषा के रूप में हिन्दी भाषा कुछ विशिष्ट प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होती है। हिन्दी के इस रूप को प्रयोजनमूलक हिन्दी ' के रूप में जाना जाता है। इसकी विस्तृत चर्चा अगले प्रकरण में की जाएगी। 

 (ग) आज हिन्दी का प्रयोग अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी हो रहा है। भारत के बाहर फीजी, मॉरिशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद और गुयाना आदि देशों में भारतीय मूल, के निवासी सांस्कृतिक महत्त्व की दृष्टि से हिन्दी का प्रयोग कर रहे हैं। यूरोप के देशों, आस्ट्रेलिया और एशिया महाद्वीप के अनेक देशों में जैसे चीन, जापान, कोरिया, आदि में विश्वविद्यालय स्तर पर हिन्दी का अध्ययन-अध्यापन हो रहा हैं। नेपाल, म्यांमार बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान, मलेशिया, सिंगापुर आदि देशों में भारतीय बड़ी संख्या में व्यापार करते हैं। उनके जीवन में हिन्दी का महत्त्वपूर्ण स्थान है। 

संक्षेप में, आज हिन्दी साहित्यिक भाषा होने के साथ-साथ भारत की 'राजभाषा' और संपर्क भाषा भी है। यह हमारी सामाजिक सांस्कृतिक एकता का माध्यम है। हिन्दी में देश की सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति हुई है। 
 
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Raj Kagadiya

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